भुजंगासना Bhujangasana

इस आसन में शी ी आृति फन उठाये हुए भुजंग अ्थात स्प जैसी बनती है इसलिए इसो भुजंगासना हा जाता है।ध्यान विशुद्धाख्या च् में। श्वास ऊप उठाते व्त पू औ नीचे ी ओ जाते समय ेच। इस आसान मे हमे पिछली हड्डी े उपी भाग ो मोड़ना हे। ये ऐसा धीखा हे जैसे ोई साप फॅन लगा े बैठा हो।

प््िया:

ंबल ो पूी तह से बिछाए। ंबल े उप उल्टा सो जाइए जिससे ी आपा मूह ज़मीन ी औ हो।
शी ो ढीला खिए। वैसी ही अवस्था मे अपने दोनो हाथों ो ंधे से थोडा नीचे ज़मीन प खे। उसे बाद सि औ छाती ो उप ी औ उठाए। ुछ दे ऐसे ही हिए जब त आप ह से। उसे बाद धीे धीे अपनी साधाण अवस्था मे आइए। आसन सिद्ध हो जाने े बाद आसन ते समयश्वास भे ुम्भ ें। आसन छोड़ते समय मूल स्थिति में आने े बाद श्वास ो खूबधीे-धीे छोड़ें। ह ोज ए साथ 8-10 बा यह आसन ें।

लाभ:

ये योगा ने से सभी तह े प्जनन ने वाले अवयव े ोगों ी देखभाल होता हे। आगे ी तफ े झुाव ो भी म िया जा सता हे। इस योगा ो ने से ुण्डलिनी सती भी बढ़ती हे। भी भी हम ऐसा भी खाना खा लेते हे जो हमसे पचता नही, तो इस योगा ो ने से हम उस खाने ो पेट से मलद्वा त ले जा सते हे। इस आसन से मेूदण्ड लचीला बनता है। पीठ में स्थित इड़ा औ पिंगला नाड़ियों पअच्छा प्भाव पड़ता है। ुण्डलिनी श्ति जागृत ने े लिय यह आसन सहाय है।अमाशय ी माँसपेशियों ा अच्छा विास होता है। थान े ाण पीठ में पीड़ा होती होतो सि्फ ए बा ही यह आसन ने से पीड़ा दू होती है। मेूदण्ड ी ोई हड्डीस्थानभ्ष्ट हो गई हो तो भुजंगासन ने से यथास्थान में वापस आ जाती है।